Tuesday, February 15, 2011

भारत की आबादी इंडिया की ताकत है


भारत की आबादी इंडिया की ताकत है

भारत और इंडिया की अवधारणा आज़ाद भारत में चले विकासक्रम के आसपास ही घुमती रहती है | भारत याने प्राचीन भारत देश की विरासतवाला भारत का सामान्य वर्ग और इंडिया याने आधुनिक विकसित भारत का विशिष्ट सत्ता एवं सुविधाभोगी वर्ग | आज के भारत में इंडिया मौजूद है पर प्रायः इंडिया में हर जगह भारत की संस्कृति और सभ्यता-संस्कारों का वह स्वरुप दिखाई नहीं पड़ता जो भारत की मिटटी में हर कहीं व्याप्त है | भारत, इंडिया को देखकर खुश होता है, पर इंडिया भारत को देखकर असहज हो जाता है | विकसित इंडिया को प्रायः यह लगता है कि भारत पिछड़ा हुआ है और इंडिया को तेजी से और अधिक विकसित न होने देने का एक महत्वपूर्ण कारक है | भारत को इंडिया का विकास देखकर लगता है कि विकसित इंडिया भारत कि जड़ों को  कटता जा रहा है |
भारत और इंडिया की जीवन दृष्टी, भाषा, भूषा, भवन, सोच, व्यवहार, रहन सहन एवं प्राथमिकता में अंतर बढ़ता ही जा रहा है | इंडिया का सपना समूचे भारत को इंडिया का अनुगामी बनाना है पर भारत के अंतर्मन में समग्र भारत को इंडिया की छाया प्रति बनाने देने का भाव नहीं है | भारत एक बहुत सरल, सहज पर गहरे वाले दर्शन कि उत्पादक, श्रमसाध्य कर्म प्रधान-जीवन शैली का नाम है | जबकि इंडिया की सतही, आरामदायक, चकाचौंधवाली, उपभोक्ता संस्कृतिवाली जीवन शैली है | इंडिया राज करना चाहता है जबकि भारत को स्वराज्य, स्वावलंबन, सादगी प्राकृतिक रूप से पसंद है | भारत किसी पर राज करना नहीं सबको साथ रखना चाहता है | भारत शांत, सहज, प्राकुतिक जीवनक्रम का हामी है पर इंडिया को भागमभाग एवं नित्य की अस्त व्यस्तता के बिना चैन नहीं है | भारत सबको साथ लेकर निरंतर जीना चाहता है तो इंडिया दूसरों की चिंता किये बगैर खुद आगे बह्दाना चाहता है | वैसे सामान्यतः देखा जाए तो "भारत" या "इंडिया" ये दोनों हमारे देश कि संज्ञा है | भारत और इंडिया इन दोनों शब्दों से सामान्यतः देश और दुनिया को हमारे देश  का ही स्मरण होता है | पर आजादी पाने के बाद सन्देश में जिस तरह का आधुनिक विकास का क्रम चला उससे भारत और इंडिया इन दोनों संबोधनों से देश के तथाकथित आधुनिक विकास के दो स्पष्ट धाराओं का बोध हमे होता है | इस प्रष्ठ्बूमी के सन्दर्भ में भारत और इंडिया हिंदी और अंग्रेजी भाषा के महज शब्द न होकर देश के विकासक्रम का बोध करने वाले दो शब्द हो गए है | वैसे तो व्याकरण के दृष्टी से कभी भी किसी भी संज्ञा का अनुवाद नहीं होता पर हमारे देश कि माया ही निराली है यहाँ हम देश के संज्ञा को लेकर भी मतभिन्नता रखते है, भारत और इंडिया के रूप में | भारत के विभिन्नता और विरोधाभासों  का एक अनोखा एवं अंतहीन सिलसिला जीवन के हर आयाम में चला आ रहा है पर इंडिया कि समग्र दृष्टी भौतिक-विकास और आर्थिक शक्ति पर पकड को लेकर है |  भारत जीवन के हर आयाम का प्राकृतिक प्रबंधन है तो इंडिया केवल सत्ता और व्यापर के प्रबंधन का प्रतीक है |हमारे देश के एक धारा देश के समग्र प्राकृतिक प्रबंधन के दृष्टी से भारत को भारत ही बनाये रखना चाहती है याने भारत के साधनों से भारत को स्वावलंबी, सजग एवं स्वाभिमानी देश के रूप में सतत बने रहने देना चाहती है | देश को बहुत जल्दी तथाकथित आगे ले जाने के व्यग्रता में भारत से इंडिया में बदलने की दिशा में जाने वाले भारतीय इंडियनओं की संख्या भी हर दिन बढाती ही जा रही है, यह भी आज के भारत का सच है | यह भी सच है कि भारत के सहज प्राकृतिक प्रबंधन की स्वदेशिधरा इंडिया के प्रबंधकों को पिचादापन या विकासविरोधी एवं यथा स्थिति की पोषक अवधारणा लगती है |
इंडिया तेज़ी से एकाएक विकास का भौतिक मॉडल खड़ा करना चाहता है | जबकि भारत निरंतर सहज प्राकृतिक परिवर्तन के क्रम को जीना चाहता है | आजाद भारत में लगातार विअकसित होने वाले भोगोलिक इलाकों की दृष्टी से देखें तो विकेन्द्रित रूप से पूरे भरत में फैली हु सैट लाख से अधिक छोटी-छोटी ग्रामीण बसाहटों को हम भरता का प्रतिनिधि मान सकते है और देशभर में फैली हुई कुछ हज़ार शहरी बसाहटों के सम्रध शक्ति समूहों को इंडिया का प्रतिनिधि मान सकते है | इस तरह भारत ग्रामीण बसाहटों का प्रतीक है और इंडिया निरंतर फैलाते शहरी या महानगरीय विस्तार का प्रवक्ता है | इंडिया उद्योग, व्यापार, एवं उpaभोक्ता गतिविधियों का केन्द्रित गतिविधियों का संचालनकर्ता है | इंडिया भौतिक व्यवहार का प्रबंधन है तो भारत जीवन में व्यवहार का प्राकुतिक प्रबंधन है |
भारत राज और बाज़ार से ज्यादा समुदाय की गतिविधि है | भारत में आज भी समुदाय का सीधा व्यवहार चलता है और समुदाय की ताकत राज और बाज़ार की ताकत से ज्यादा प्रभावी है | भारत के ग्रामीण हिस्सों में आज भी हात  के साप्ताहिक व्यवस्था प्रभावी है याने सप्ताह में एक दिन दैनन्दिनी जरूरतों की खरीदी बिक्रइ का व्यवहार निरधारित  है एवं इंडिया में चौबीसों घंटों, बारह माह सिर्फ बाज़ार ही बाज़ार | बाज़ार के हाल से इंडिया बेहाल, बाज़ार चढ़ा तो इंडिया खुश, बाज़ार गिरा तो इंडिया निराश |
वैश्वीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के इस दौर में आज भी भारत की कृषि एवं पशु आधारित अर्थव्यवस्था का अपना अनोखा जीवित अर्थशास्त्र है | भारत की अर्थव्यवस्था में आज भी बकरी, मुर्गी, दुधारू पशु एवं वास्तु, अनाज या श्रम विनिमय की एक प्रभावी एवं जीवंत आर्थिक व्यवहार की प्राचीन प्रणाली सहजता एवं सफलता से चल रही है | ग्रामीण भारत का आर्थिक व्यवहार साकार, वस्तुओं ( पशु, पक्षी, अनाज ) या श्रम के विनिमय पर आधारित है जिसमे तेजी मंदी का क्रम एकाएक नहीं आता और आर्थिक विनिमय के व्यवहार के सामान तनाव न होकर शांति एवं विश्वास बना रहता है | जबकि इंडिया का सारा आर्थिक व्यवहार अब निराकार स्वरुप में आंकड़ों का खेल हो गया है | तेजी मंदी कि सुनामी इंडिया के आर्थिक व्यवहार को सतत तनावपूर्ण एवं आशंकाग्रस्त बनाये हुए है | एकाएक लखपति से करोरेपति और करोडपति से लखपति बन जाने का खेल इंडिया की अर्थव्यवस्था का आम भाव बनता जा रहा है | इंडिया का सारा आर्थिक व्यवहार शुद्ध आंकड़ों का निराकार खेल हो गया है जिसमे असंभव घटनाचक्र भी संभव है |
भारत और इंडिया की ये परस्पर विरोधी जीवन के विकास की धाराएँ एक दुसरे की परस्पर विरोधी दिखाई देना के बाद भी एक दुसरे की पूरक भी बनती जा रही है | भारत और इंडिया की एक अरब से भी ज्यादा की मनुष्य संख्या आज की दुनिया के बाज़ार का सबसे बड़ा आकर्षण है | बीस करोड़ का इंडिया अस्सी-पिच्यासी करोड़  के भारत  के कारण ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के दौर में एक आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित होने का आभास दे रहा है |
इंडिया की आर्थिक अर्थव्यवस्था एवं प्रबंधन अतिशय खर्च या अनुत्पादक दिखावटी खर्च या बुनियादी जीवन की जरूरतों पर ही खर्च के सिद्धांत पर आधारित है | इसीलिए इंडिया की आबादी पैसों की दुनिया की गिरफ्त में आ गयी है, जबकि भारत की अधिकांश आबादी पैसों की द्रष्टि से इंडिया के मुकाबले अत्यंत गरीब नज़र आती है, उसके पास जीवन की बुनियादी जरूरतों पर खर्च करने लायक पैसा भी नहीं है | फिर भी वह संतोष और शक्ति के साथ जी रही है |
एक तरफ बिना साधन, बिना विकास और अधोसंरचना वाली भारत की कोटि-कोटि जनता है जो जीवन के प्राकृतिक प्रबंधन के सहारे अपना जीवा शक्ति एवं संतोषी भाव के साथ जी रही है और दूसरी तरफ इंडिया का आधुनिक विकसित समाज है जिसके विकास, अधोसंराचानागत खर्चों की कोई मर्यादा ही नहीं है | अपार सम्पदा का संग्रह होने पर भी इंडिया की इच्छा आकंखाओं की तृप्ति नहीं होती| इंडिया में भावों का आभाव स्पष्ट दिखाई देता है, पर भारत में अनंत आभाव होने पर भी जीवन के सरे भाव सहजता से दिखाई देते है |
भारत और इंडिया दोनों आपस में इस तरह रच बस गए है कि उन्हें अब अलग नहीं किया जा सकता | इंडिया को यह भूलना नहीं चाहिए कि भारत की मनुष्य संक्या की नींव पर ही इंडिया के आर्थिक-साम्राज्य की अट्टालिकाएं खड़ी हुई है | इंडिया के राज और बाज़ार का साम्राज्य भारत के संख्याबल को यदि समस्या मानाने की गलती करेगा तो वह इंडिया के राज और बाज़ार की चकाचोंध को खो बैठेगा और यदि इंडिया भारत की जनसंख्या को अपनी मूल पूँजी या शक्ति मानकर भारत और इंडिया के राज़, बाज़ार और जीवन की जरूरतों में सहज तालमेल बनाने की दृष्टी विकसित करेंगे तो आज की खुली अर्थव्यवस्था एवं वश्वीकरण के इस दौर में हम भारत और इंडिया दोनों की जीवन शैली का सहज एवं स्थायी प्रबंधन करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे |
यदि हमने अकेले इंडिया के विकास या सपनो के प्रबंधन को ही जोर शोर से अपनाया और भारत के अपनो के सपनो के बारे में नहीं सोचा तो फिर इंडिया की चकाचौंध को भारत की मजबूत नींव नहीं मिल पायेगी | भारत और इंडिया राज़, काज, बाज़ार और जीवन जीने की दो दृष्टियाँ हैं | भारत की जीवन शैली स्थानीय साधनों को अपनाकर व्यापक "वसुधेव कुटुम्बकम" की जीवन दृष्टी है और इंडिया विश्व अर्थ व्यवस्था से भरपूर एकांकी जीवन शैली का प्रतिरूप है जिसका विस्तार न केवल भौतिक संसाधनों के हिसाब से अत्यंत खर्चीलअ है वरन प्राकृतिक संसाधनों को भी थोड़े समय में ख़त्म या प्रदूषित करने की आशंका को भी फलीभूत कर सकता है | भारत और इंडिया का सतत सहयोगी अपनत्व का भाव भारत और इंडिया ही नहीं सभी याने सारी दुनिया के मंगलमय जीवन के द्वार खोल सकता है | यही भारत की विरत वैचारिक विरासत है जिसे इंडिया ने कम करके नहीं आंकना चाहिए |

शब्दों का सफरनामा

जमीन से पैदा हो रहे गुंडे


संवाद पर भारी पड़ता विवाद


नी हुओ कांदा को ब्याव

नी हुओ कांदा को ब्याव

तरंगों ने बदला जीने का रंग-ढंग


सामयिक

सामयिक

तरंगों ने बदला जीने का रंग-ढंग

अनिल त्रिवेदी

बातचीत करना एक कला है। बात को सुनने में रस लेना व बातचीत में यथासंभव हस्तक्षेप या भागीदारी अपने आप में कला है। आजकल हर कोई बोलना तो चाहता है पर सुनना नहीं चाहता। मनुष्य की बोलने चालने की चाह अन्तहीन है। श्रुति और स्मृति से प्रारंभ हुआ मनुष्य समाज आज तकनीकी रूप से विकसित होकर मोबाइल फोन और सीडी तक आ पहुंचा है। मनुष्यों की बोलने की आदत को ही आधुनिक मनुष्य ने इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी में बदल दिया है। आज का पूरा विश्व तरंगमय हो गया है। ध्वनि तरंगों का इतना व्यापक फैलाव कभी भी नहीं हो पाया था। आज दुनिया के किसी भी कोने में अपनी बात पहुंचाना हो तो चलता-फिरता मनुष्य इस काम को करने का साधन पा गया है। मनुष्यता के इतिहास में आज तक उसका कोई आविष्कार इतनी तेजी से आम आदमी की पहुंच में नहीं आया। आज के काल में जिस तेजी से मोबाइल का लोकव्यापीकरण हुआ है उसने मनुष्य की बातचीत करने की चाह को दुनिया के सबसे बड़े नए व्यापार में बदल दिया है। अभी तक मनुष्य की आवाज स्वयं मनुष्य के लिए धन दौलत कमाने के अवसर जुटाती थी। कोई अच्छा गाता था तो सुमधुर आवाज के बल पर पैसे कमा लेता था। कथा वार्ता कहकर, भाषण देकर या नाटक करके पैसे पा जाता था। आवाज के बल पर रेडियो-टीवी में उद्‌घोषक बन जाता था। मनुष्यता के इतिहास में मोबाइल के रूप में ऐसा साधन आया जिसके कारण हर किसी के द्वारा की गई सामान्य बात, बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए अनन्त धन दौलत के महासागर में बदल गई। अभी तक जमीन जायदाद की खरीदी-बिक्री में ही दुनियाभर के व्यवसाय या घोटाले होते थे। सारी राजनीति और सत्‌ता का प्रबन्धन जमीनों के खरीदने, आवंटन, अतिक्रमण, कब्जे करने या कबाड़ने तक ही सीमित था। पर आज के काल में ध्वनि तरंगों को खरीदना-बेचना देश और दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार और घोटालों का महाअवसर बन गया। साकार जमीन के बजाय निराकार ध्वनि तरंगे सत्‌ता की राजनीति का सबसे बड़ा आकर्षण हो गई। ध्वनि तरंगों के आवंटन में पक्षपात या बन्दरबांट ने आज भारत का सबसे बड़ा घोटाला कर डाला। मन्त्री राजा से अभियुक्त राजा तक की संचार यात्रा भारत में तरंगों के व्यापार में आज तक के सबसे बड़े भ्रष्टाचार का पर्याय बन गई। हमारे देश में भंग की तरंग में डूबना कुछ लोगों को ही अच्छा लगता था। पर ध्वनितरंगों के नशे में पूरी तरह डूब जाना आज की सत्‌ता की राजनीति और कॉर्पोरेट्‌स के व्यापार की प्रमुख व्यस्तता है। देश और दुनिया ध्वनि तरंग में समा गई है। देश के बाल, वृद्ध व युवाओं पर ध्वनि ख्ब् घंटे के साथी हो गए! तोल-मोल या सोच-समझकर बोलने की हमारी सनातन परंपरा रही पर आज मनुष्य को ललचाया जा रहा है- कर लो दुनिया मुट्ठी में। मोबाइल को दिनभर हाथ में पकड़े हम दुनियाभर को पकड़ सकते हैं। तरंगों के इस खेल में नया खेल आदमी की जिन्दगी में यह आया कि अब उसे प्रतिदिन बोलने के पैसे भी चुकाना पड़ रहे हैं। अभी तक तो ये था कि दाल-रोटी के इर्द-गिर्द ही अधिकांश जीवन चलाते थे। जिन्दगी में टी टाइम या लन्च टाइम जैसे ही प्रसंग थे। पर अब मनुष्य की जिन्दगी में टॉक टाइम का नया प्रसंग आ गया। आज के मनुष्य को सूखीसट बातचीत में मजा उस तरह नहीं आता है। गरीबी रेखा से नीच का आदमी हो या अमीरी रेखा से ऊपर का आदमी, दोनों जिन्दगियों में मुफ्‌त की रूखी-सूखी बातचीत का दौर खत्म हो गया है! वाचाल मनुष्य के हाथ में जब बिना टॉक टाइम का मोबाइल होता है तो उसकी तत्परता देखते ही बनती है। आज के अधिकांश मनुष्य बिना चाय या भोजन के खुद भूखे रहना पसन्द कर लेते हैं पर अपने मोबाइल को भूखा रखना सहन नहीं करते। आज मनुष्य की जिन्दगी में ध्वनि तरंग ने समूचे लोकजीवन के साथ ही ध्वनितंरगों की सत्‌ता और व्यापार इतना ताकतवर है कि हमारी संसद में पक्ष-विपक्ष की चहल-पहल पूरी तरह बन्द है।

गांधीवादी चिन्तक

टी टाइम और लन्च टाइम का दौर गया, अब तो टॉक टाइम का दौर-दौरा है!

Monday, February 14, 2011

विचारों के देश मैं पैसों का अखंड महाभोज- लेखक-अनिल त्रिवेदी


विचारों के देश मैं पैसों का अखंड महाभोज- लेखक-अनिल त्रिवेदी

भारत शुरू से ही दर्शन और विचारो का देश रहा है,लेकिन पिछले कुछ समय से यहाँ जीवन के हर क्षेत्र में विचार से ज्यादा अर्थ की ताकत निरंतर और अधिक तेजी से बढ़ रही है. यह एक ऐसा देश बनता जा रहा है,जिसमे आपको ख़ुद से भिन्न विचार वाले व्यक्ति को ख़ुद के विचार से सहमत करने के लिए विचारों की नही लोभ-लालच के साधनों हथकंडो या रणनीति की जरुरत पड़ती है|भारत में विचार का स्थान सामान्यतः लोभ-लालच या रुपयों की दुनिया के हाथों मैं केंद्रित होता जा रहा है। छोटी-मोटी सभा सोसायटी से लेकर लोकसभा जैसे सर्वोच्च सदन तक चुनकर पहुँचने के लिए परिवर्तन के वाहक विचार प्रक्रिया के स्थान पर मुद्रा का विनिमय यही आज हममे सेअधिकांश को आसन मार्ग लगने लगता है। कीसी व्यक्ति के पास बहुत पैसा है तो अधिकांश समाज उसे धनबली मानता है और उसके सानिध्य में कुछ न कुछ प्रसाद पाने की आकांक्षा या भीड़ बनाये रखने का प्रचलन हर क्षेत्र में बड रहा है,वही शुद्ध विचारशील सरस्वती पुत्र के पास शुद्ध ज्ञानार्जन की आकांक्षा लेकर आज भी इक्का-दुक्का व्यक्ति ही पहुँच पाते हैं।
विचार की कोख से जन्मा पैसा ही आज सबसे बड़ा विचारहंता हो गया। जीवन के हर क्षत्र में पैसे के अत्यधिकप्रचलन से बाहर करने की राह पकड़ ली है। यही कारण है की समाज विचार पर केंद्रित होने की बजाये पैसे पर केंद्रित होताजा रहा है। अर्थ बिना सब व्यर्थ का आदर्श जीवन हर क्षेत्र में गठरी पैठ बनता जा रहा है और अधिकांश लोगों के मन एवं जीवन में विचार निष्ठां के बजाये शुद्ध अर्थ्निष्ठा का जोर बढ़ रहा है। किसी भी तरह का पैसा समाज को सम्मोहित कर रहा है पर किसी भी किस्म का विचार समाज व्यक्ति और विचारों को सजग और चैतन्य बनने में सफल नही हो पा रहा। यह वर्तमान की सबसे बडी चुनौती है की महज पैसे की दुनिया से विचारों की दुनिया का मुकाबला कैसे करें? आज भारत की राजनीती ही नही पुरे लोकजीवन में मुद्रा का अतिरिक्त अवैध विनिमय लोकव्यवहार और दस्तूर बनता जा रहा है। आप रेल में यात्रा कर रहे है और रिजेर्वेशन चाहिए तो पैसे देकर सीट हासिल कर सकते हैं। यह एक ऐसा मान्य साधन बन गया है कही भी इस्तेमाल कर परिचित तो छोडिये अपरिचित से भी मनचाहा व्यवहार करवा सकते हैं। बच्चे में योग्यता न हो , लेकिन लाखो की कैपिटेशन फीस अदा कर मनचाही शिक्षा के लिए प्रवेश दिला सकते हैं। यह बात आम धारणा बन गई है की की जो काम नियम कायदों से सम्भव नही वह पैसे से तत्काल सम्भव हो सकता है। इसी का नतीजा है की भारत के लोकमानस में यह भ्रम आम हो गया है की पैसे की ताकत नियम कायदे से अधिक है। हमारे राज्य संवेधानिक रूप से नियम-कायदे से चलने वाले राज्य हैं। राज्य अपनी कार्यप्रणाली में किसी के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार नही कर सकते और यदि करते हैं तो देश के नागरिक को यह संवेधानिक उपचार उपलब्ध है की वह राज्य द्वारा किए गए भेदभाव के विरूद्ध न्यायलय में जाकर अपना अधिकार हासिल करे । इस कानूनी स्थिति के मौजूद होते हुए भी समाज में यह ग़लत धारणा बनती जा रही है की क़ानून तो दिखावटी गहना है। बिना लेन-देन कुछ भी नही होता,होगा भी तो देर से। इसलिए तुंरत कार्य कराने का व्यवहारिक तरीका क़ानून नही पैसों का लेनदेन है।
संविधान के होते हुए भी राज्य और समाज पैसे के आधार पर विशिष्टता या तत्परता से कोई कम कराने की कार्यप्रणाली विकसित कर रहे है। जैसे देश के कई धार्मिक स्थलों में ज्यादा चढावा या नकद पैसा देकर दर्शन करने वाले विशिष्टता का तमगा लिए लाइन में खडे हुए बिना सीधे गर्भग्रह में जाकर दर्शन कर सकते हैं। इस व्यवस्था पर गुस्सा या भेदभाव का अहसास होने के बजाये हम इस व्यवहारिक व्यवस्था की संज्ञा देते हैं। आपसी बातचीत में यह आम बोलचाल का मुहावरा बन गया की नौकरी में निश्चित एवं निर्धारित वेतन को सूखी तनख्वाह माना जाता है। जिन पदों पर वेतन के आलावा कोई अतिरिक्त राशि पाने की गुंजाईश न हो,उन पदों पर नियुक्त अधिकांश लोग अपनी नियति को कोसते रहते हैं की यहाँ पर तो आगे बढ़ने का मौका ही नही है। सूखी तनख्वाह में कैसे गुजारा होगा? यह दुःख आज के समाज का सबसे बड़ा दुःख बनता जा रहा है। यही वर्तमान का खुला रहस्य की हममे से आधिकांश को कंही कोई गड़बड़ नजर नही आती,क्योंकि हम तमाम तरह की आर्थिक गडबडी को लोभ-लालचवश निजी और सार्वजनिक जीवन का लोकव्यवहार बनाते जा रहे हैं।